Tuesday 27 October 2009


मैं इतना तो बुरा आदमी नहीं हूं
अमिताभ फरोग
‘देशद्रोही’ जैसी देशभक्ति फिल्म के कारण सुर्खियों में आए कमाल राशिद खान दु:खी हैं कि; ‘बिग बॉस-3’ में उनकी छवि को मटियामेट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई, जबकि वे इतने बुरे इंसान कतई नहीं हैं। ‘बिग बॉस’ से बाहर किए जाने के बाद कमाल अपने गुण-दोषों का विश्लेषण करने में लगे हैं।
हिंदी फिल्म ‘सितम’ के अलावा कुछ भोजपुरी फिल्मों के निर्माता कमाल आश्चर्य जताते हैं-‘मैं अब भी नहीं समझ पाया हूं कि; आखिर बिग बॉस का कन्सेप्ट क्या है? दरअसल, हर व्यक्ति का अपना एक अलग मिजाज होता है। उनमें अच्छाई भी होती हैं, तो बुराई भी। ऐसी स्थिति में एक घर में; 13 लोगों में एक संग रहते हुए वाद-विवाद होना स्वाभाविक है। लेकिन मैं हैरान हूं कि; आखिर मैं ही क्यों बाहर हुआ?’खुद को शॉर्ट नेम ‘केआरके’ कहलाना पसंद करने वाले कमाल थोड़े भावुक होकर कहते हैं-‘मैंने शो के 20 दिनों की सीडीज मंगाकर देखी हैं। मेरा जैसा उग्र रूप टेलीविजन पर दिखाया गया; वैसा मैं नहीं हूं। रोहित वर्मा और राजू श्रीवास्तव से मेरा झगड़ा हुआ, लेकिन ऐसे छोटे-मोटे विवाद किस घर में नहीं होते?’अपने दोस्तों के बीच हेल्पफुल नेचर के कारण लोकप्रिय कमाल दो टूक कहते हैं-‘मुझसे ज्यादा तो बिंदु ने झगड़ा किया। कभी वह पूनम पर भड़का, तो कभी बख्तियार को मारने दौड़ा। इस्माइल का झगड़ा भी तो हुआ था? मुझे लगता है कि मेरी बॉडी लैंग्वेज, लाइफस्टाइल और बातचीत के तरीके में शो वालों को मसाला नजर आया, तभी उन्होंने चुन-चुनकर छोटे-मोटे विवादास्पद दृश्य दर्शकों को दिखाए?’कमाल खुलकर बतियाते हैं-‘मैं वहां जिंदगी का एक अनूठा अनुभव लेने गया था। वहां आनंद और तकलीफ दोनों की अनुभूति हुई। माइक नहीं पहनने के कारण जेल गया, तो घर-परिवार के कामकाज में भी हाथ बटाना पड़ा। फिर भी मैं यही कहूंगा कि; घर के भीतर भी मजे में था और अब बाहर आने के बाद भी खुश हूं।’‘देशद्रोही-2’ की तैयारियों में जुटे कमाल इस अफवाह का खंडन करते हैं, जिसमें कहा जा रहा है कि; वे शर्लिन को इस फिल्म में हीरोइन ले सकते हैं। कमाल के मुताबिक,‘देशद्रोही एक देशभक्ति फिल्म है, इसमें शर्लिन का क्या काम? हां, अगली जो भी फिल्म बनाऊंगा; यदि उसमें सेक्सी गर्ल का कैरेक्टर निकला, तो उसे अवश्य मौका दूंगा।’कमाल निवेदन करते हैं-‘मैं दर्शकों से कहना चाहूंगा कि वे बिग बॉस को एक प्रोग्राम के नजरिये से देखें और किसी की छवि को लेकर कोई धारणा न पालें।’उल्लेखनीय है कि ‘बिग बॉस-3’ के प्रसारण के बाद ‘कलर्स चैनल’ की टीआरपी में जबर्दस्त उछाल आया है।

Sunday 25 October 2009


बोले तो; अपुन की तो लाइफ बन गई
अमिताभ बुधौलिया 'फरोग'
बिंदास चैनल पर शनिवार से रियलिटी शो-‘बिग स्विच’ ऑन एयर हुआ है। एक घंटे के इस शो में 10 रिच फैमिली के यूथ स्लम में रहने वाले इतने ही युवाओं के संग 14 दिन बिताएंगे। हाई सोसायटी की लाइफस्टाइल को छोड़कर स्लम में पहुंचे ये रिच यूथ अपने साथी ‘स्लम बॉय/गर्ल’ के ख्वाब को पूरा करने में हेल्प करेंगे। इस शो के रिच यूथ सन्नी सारा और ‘स्लम बॉय’ अभिषेक प्रसाद गुरुवार को मीडिया से मुखातिब हुए।
मैं रिस्पांसिबल हो गया हूं(रिच यूथ : सन्नी सारा)
मुंबई के एक रईस परिवार के युवक 28 वर्षीय सन्नी सारा अपने पार्टनर स्लम बॉय ‘अभिषेक प्रसाद’ के संपर्क में आकर खुद में काफी बदलाव महसूस कर रहे हैं। वे बताते हैं-‘मैंने कभी अभावों की जिंदगी नहीं जी। स्लम में जाकर मैं काफी रिस्पोंसिबल हो गया हूं। मुझे लगता है कि; हमें दूसरों की हेल्प करनी चाहिए। इस शो में शामिल हुए बाकी रिच बॉय और गर्ल्स सबने मिलकर फैसला किया है कि; शो के बाद भी अभावों में जीने वाले स्लम बॉयज/गर्ल्स के सपने साकार करने में हम हेल्प करते रहेंगे।’सन्नी के मुंबई में कई रेस्टोरेंट और नाइट क्लब हैं। वे एक ईवेंट मैनेजमेंट कंपनी का संचालन भी करते हैं। सन्नी हाई सोसायटी से अचानक स्लम लाइफ में जाने का अनुभव शेयर करते हैं-‘मैं सिंगापुर में छुट्टियां मनाकर जैसे ही लौटा, अगले दिन शो के लिए स्लम एरिया जा पहुंचा। पहले शो को लेकर काफी एक्साइटमेंट था, लेकिन जब स्लम लाइफ जीनी पड़ी; तो दिल बोला-चल भाग जा। बाद मैं मैंने आत्मचिंतन किया कि; नहीं, यहां रहकर एक स्लम बॉय की जिंदगी बदलना मेरी रिस्पांसबिलिटी है।’ अभिषेक में आए बदलाव पर सन्नी उत्साह से बोलते हैं-‘पहले वह बेहद शर्मिला था, अब उसका कान्फिडेंस लेवल हाई हो गया है। वह अपने फ्यूचर को लेकर अवेयर भी हो गया है।’
मैंने जीतना सीखा है(स्लम बॉय : अभिषेक प्रसाद)
सन्नी के पार्टनर अभिषेक अपनी जिंदगी में इस अप्रत्याशित बदलाव से बेहद अभिभूत हैं। बीकॉम थर्ड ईयर के स्टूडेंट अभिषेक बिंदास बोलते हैं-‘यह मेरे और परिवार वालों के लिए किसी सपने जैसा था। सन्नी ने मुझे काफी कुछ सिखाया। उठने-बैठने, बातचीत का तरीका; कहूं तो बॉडी लैंग्वेज से लेकर लाइफस्टाइल सब कुछ चेंज हो गई है। सन्नी ने मुझे जिम्मेदार भी बना दिया है। हां, फिर भी मैं यह जरूर कहूंगा कि-कितने भी ऊंचे मुकाम पर पहुंच जाओ, जहां से चले थे; उस जगह को कभी नहीं भूलो। मेरी लाइफ बदली है, एट्टीट्यूट नहीं।’अभिषेक शेफ बनना चाहते हैं। वे बताते हैं-‘मैंने बेकरी का शॉर्ट टर्म कोर्स किया है। मेरे पास इतने पैसे नहीं है कि; किसी बड़े इंस्टीट्यूट में पढ़ सकूं। पर मैं अपने ड्रीम को लेकर कान्फिडेंट हूं। सन्नी कहता है कि; कुछ भी हो जाए, स्ट्रगल करते रहना, कभी हार न मानना। मैं भी जीतकर दिखाऊंगा, अपने सपने साकार करके रहूंगा।
‘बिग स्विच’ के बारे में
इस रियलिटी शो का निर्माण एंडेमॉल कंपनी ने किया है। शो के लिए वर्सोवा(मुंबई) के एक स्लम एरिया में स्टूडियो बनाया गया है। इस स्टूडियो में स्लम बस्ती बनाई गई है। यहां रहने वाले प्रतिभागियों को भौतिक सुख-सुविधाओं से परे स्लम लाइफ जीना पड़ेगी। इसमें फिल्म, पॉलिटिक्स और बिजनेस से जुड़ीं नामचीन हस्तियों के 10 लड़के-लड़कियों को बतौर रिच यूथ शामिल किया गया है। ये लोग इतने ही स्लम बॉय/गर्ल्स के संग रहकर उनकी जिंदगी बदलने का टॉस्क पूरा करेंगे। इसके विनर को बतौर प्राइज 10 लाख रुपए मिलेंगे। यह मनी स्लम बॉय/गर्ल के सपने पूरा करने में काम आएगी।

Monday 5 October 2009


मैं अपने अभिनय को खुद के मापदंड पर परखता हूं
अमिताभ फरोग
मनोज वाजपेयी; एक ऐसा नाम हैं, जिनका अभिनय सिनेप्रेमियों के मस्तिष्क पर स्थायी छाप छोड़ जाता है-वे मानते हैं कि; ज्यादातर अच्छी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर पैसा नहीं बंटोर पातीं, जबकि वे सिनेमाई संस्कृति के लिहाज से श्रेष्ठ कही जा सकती हैं। उनका इशारा ‘1971’ की ओर था, जिसे हाल में बेस्ट फीचर फिल्म का ‘राष्ट्रीय पुरस्कार’ मिला है। ‘राजनीति’ में महत्वपूर्ण किरदार निभा रहे मनोज पीपुल्स समाचार ’ से मुखातिब थे...


मनोज वाजपेयी शब्दों की जुगाली किए बगैर दो टूक कहते हैं-‘जो फिल्में आत्मसंतुष्टि देती हैं, सिनेमा की धारा बदलती हैं, वे फिल्में हिट नहीं हो पातीं। जब कोई मुझसे पिंजर की बात करता है, स्वामी पर चर्चा छेड़ता है या 1971 में मेरे अभिनय को याद रखता है; तो मुझे बहुत अच्छा लगता है। भले ही पिंजर नहीं चली, तमन्ना, जुबैदा पैसा नहीं कमा सकीं; लेकिन वे अच्छी फिल्में थीं। अक्स नहीं चली, लेकिन उसे क्लासिकल सिनेमा की श्रेणी में रखा गया।’
‘अक्स’ में बिग-बी के आगे ‘कद्दावर’ साबित होने के टेढ़े प्रश्न पर वे सुलझे शब्द ‘यूज’ करते हैं-‘अमिताभ बच्चन बहुत गुणी अभिनेता हैं। उनकी बॉडी लैंग्वेज, डायलॉग डिलेवरी; सबकुछ अनुकरणीय है। मैं फिल्म इंडस्ट्री से सिर्फ दो अभिनेताओं अमिताभ और दिलीप कुमार का जिक्र करना चाहूंगा, जिनसे हमने बहुत कुछ सीखा है।’
अपने डेढ़ दशक के फिल्मी करियर से संतुष्ट श्री मनोज अपना दृष्टिकोण सामने रखते हैं-‘मैंने अच्छा अभिनय किया या नहीं; यह मैं अपने मापदंड पर परखता हूं। यदि कोई अभिनेता अपनी दृष्टि में संतुष्ट है, तो यही उसका सम्मान है। कोई फिल्म बॉक्स ऑफिस पर करोड़ों कमाए या घटिया साबित हो जाए, यह कोई कसौटी नहीं होती कि; मैंने अच्छा काम किया या नहीं! हालांकि मैं फिल्में चलने के लिए नहीं करता। फिर भी उनका चलना इसलिए आवश्यक है क्योंकि; उनसे प्रोड्यूसर की कमाई होती है और मुझे काम मिलता है।’
मनोजजी खुद के मूल्यांकन का निचोड़ पेश करते हैं-‘कुछ फिल्में अच्छी बनती हैं, कुछ बुरी या कुछ अच्छी नहीं बन पातीं; यह और बात है, लेकिन मैं हर तरह की भूमिकाओं के लिए जाना जाता हूं।’ ‘जुगाड़’ जैसी फिल्म पर वे दो टूक कहते हैं-‘मैं हिट नहीं; अच्छी फिल्मों के लिए पहचाना जाता हूं। ऐसी मिस्टेक कम ही होती हैं। 15 साल के करियर में मैं दो राष्ट्रीय पुरस्कार ले चुका हूं, दर्शकों की कसौटी पर खरा उतरने के लिए और क्या चाहिए?’
आलोचकों के मापदंड पर खरी नहीं उतरी ‘मनी है तो हनी है’ को लेकर मनोजजी ‘खरे शब्दों’ का वाक्य विन्यास संजोते हैं-‘मैं गोविंदाजी के साथ काम करना चाहता था। मैं खुद को उनके सामने परखना चाहता था। मैं मानता हूं कि; मेरे अभिनय ने निराश नहीं किया।’
‘राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय’ में सिलेक्शन न हो पाना आज भी इस ‘मझे अभिनेता’ के भीतर टीस बनकर मौजूद है-‘उस वक्त एनएसडी को लेकर ठीक वैसा जुनून था, जैसा एक फिल्म अभिनेता बनने को लेकर होता है। वह मेरी एक ऐसी चाहत थी, जो अधूरी रह गई।’
भोपाल में ‘राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय’ की संभावनाओं पर मनोज स्वीकृति की मुहर लगाते हैं-‘देश में टैलेंट की कोई कमी नहीं है। अगर नहीं हैं, तो अच्छे संस्थान और सही व्यक्ति; जो उनका ठीक मार्गदर्शन कर सकें। भोपाल सक्षम है। यदि यहां एनएसडी आए, तो इससे अच्छी बात और क्या होगी! ऐसे विद्यालय तो हर प्रांत में होना चाहिए।’
‘सत्या’ के भीकू म्हात्रे का जिक्र छेड़ते ही वे दार्शनिक अंदाज में बोलते हैं-‘सत्या एक ही बनती है। शोले और दीवार भी एक ही बनती है। मनोज बाजपेयी सरीखे अभिनेता और आ जाएंगे, कुछ और फिल्में बनेंगी; लेकिन इन जैसी लैंडमार्क फिल्में दुबारा नहीं बन सकतीं।’
भोपाल में फिल्म प्रोडक्शन की बढ़ती संभावनाओं पर मनोजजी प्रशंसकीय लहजे में कहते हैं-‘निश्चय ही यह भोपाल के लिए एक कॉम्पलीमेंट है। प्रोड्यूसर/डायरेक्टर भोपाल को शूटिंग के लिहाज से सुरक्षित मान रहे हैं। अगर वो बोल रहे हैं कि; यहां के लोग सहयोगी हैं, अच्छे हैं, तो इससे बड़ी प्रशंसा और क्या होगी!’
अक्टूबर में रिलीज होने जा रही ‘एसिड फैक्ट्री’ को लेकर मनोजजी उत्साहित हैं-‘काफी उम्मीदें हैं। बहुत अच्छी फिल्म बनी है। यह मेरे लिए एक नया प्रयोग है।’
‘ब्लॉग’ लेखन के सवाल पर मनोज खुलासा करते हैं-‘अभी कम्प्यूटर फ्रैंडली नहीं हूं। टाइप भी ठीक से नहीं आती, इसलिए जब भी वक्त मिलता है, किसी से डिक्टेड करात हूं और फिर उसे ब्लॉग पर पोस्ट करता हूं।’

Monday 28 September 2009




भोपाली अमीरों का फिल्मी दांव
अमिताभ फरोग
आखिर प्रकाश झा ‘राजनीति’ लेकर भोपाल ही क्यों आए? झा ही क्यों; ‘मकबूल’ फेम विशाल भारद्वाज ‘प्रॉवोक्ड’ फेम जग मूंदड़ा, ‘कांटे’ फेम संजय गुप्ता और अब; आमिर खान भोपाल में फिल्म बनाने को लेकर इतनी दिलचस्पी क्यों दिखा रहे हैं? फिल्म प्रोडक्शंस से जुडेÞ विश्वस्त सूत्रों की मानें तो; पूंजी निवेश के हिसाब से बॉलीवुड यहां के बिल्डर्स और नेताओं के लिए सबसे चोखा धंधा साबित हो रहा है।

राजकपूर के दौर से हिंदी फिल्मों में भोपाल का पैसा लगता रहा है, लेकिन पिछले एक दशक में पैसे का गणित लाखों से करोड़ों में पहुंच गया है। इन दिनों प्रकाश झा भोपाल में ‘राजनीति’ शूट कर रहे हैं। इस प्रोडक्शन से जुड़े एक सूत्र के मुताबिक,‘प्रकाश झा की भोपाल में आवाजाही पांच-छह साल के दौरान ज्यादा बढ़ी है। राजनीति भोपाल में ही क्यों शूट हो रही है? वो भी तब; जब मल्टीस्टारर फिल्म होने से यहां उसकी प्रोडक्शन कास्ट 10 से 15 प्रतिशत बढ़ गई है? दरअसल, इसमें भोपाल के कुछ लोगों का खासा पैसा लगा होने का अनुमान है।’
हाल में प्रकाश झा ने फिल्म के कलाकारों को मीडिया से मुखातिब कराया था, तब फिल्म के पटकथा लेखक अंजुम रजब अली ने खुलासा किया था कि; श्री झा कुछ साल पहले एक गवर्नमेंट प्रोजेक्ट(डाक्यूमेंट्री फिल्म) के सिलसिले में भोपाल आए थे। उसी दौरान उन्होंने राजनीति की शूटिंग के लिए भोपाल को फाइनल कर दिया था।
पिछले दिनों एक युवा निर्देशक मंगल फौजी भी एक फिल्म प्रोजेक्ट को लेकर कुछ मंत्रियों से मिले थे। यह फिल्म ‘सरकार की उपलब्धियों का डाक्यूमेंटेशन’ से अधिक कुछ नहीं है। सूत्रों के मुताबिक फाइनेंस की उम्मीद में नेताओं और उनके करीबी बिल्डर्स तक पैठ/पहुंच बनाने का यही सबसे सरल और उचित रास्ता होता है। यही कारण है कि बड़े-बड़े फिल्म निर्देशक लो बजट के सरकारी प्रोजेक्ट को भी सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं।
हिंदी फिल्म ‘वाइफ है, तो लाइफ है’ और भोजपुरी फिल्म ‘दूल्हा बाबू’ के निर्माता/ निर्देशक भोपालवासी वीरेंद्र राठौर मानते हैं-‘चैनलों की भरमार होने से सेटेलाइट राइट्स भी लाखों/करोड़ों रुपए में बिक जाते हैं। अब तो 90 प्रतिशत फिल्में थोड़ा-बहुत ही सही; मुनाफा कमा ही लेती हैं।’ वीरेंद्र अक्टूबर में एक भोजपुरी अलबम शूट करने भोपाल आ रहे हैं, जिसमें भी भोपाल से ही पैसा जुटाया गया है।
पिछले दिनों ‘ओशो महोत्सव’ में फिल्ममेकर विशाल भारद्वाज सपत्नीक(गेंदा फूल फेम-रेखा भारद्वाज) शरीक हुए थे। विशाल भोपाल को अपना दूसरा घर मानते हैं? वजह; उनके करीब बताते हैं-‘विशाल की फिल्मों को भोपाल से फाइनेंसर मिलते रहे हैं।’ संभव है कि ओशो महोत्सव सिर्फ एक बहाना था, उनका ‘ध्यान’ तो अपने अगले प्रोजेक्ट के लिए फाइनेंसर ढूंढना रहा होगा! बताया जाता है कि विशाल की ‘मकबूल’ को भी भोपाल के किसी बिल्डर ने फाइनेंस किया था। इसमें एक शर्त रखी गई थी कि; फिल्म यहीं शूट होनी चाहिए।’
चर्चित निर्देशक संजय गुप्ता की ‘कांटे’, जगदीप की ‘सूरमा भोपाली’, राजश्री प्रोडक्शन की ‘एक विवाह ऐसा भी’ और ग्रेवी ग्रेवाल निर्देशित ‘कुशर प्रसाद का भूत’ जैसी तमाम फिल्मों में भोपाल से पैसा लगाया गया है। उल्लेखनीय है कि ‘कांटे’ के एक प्रोड्यूसर मशहूर पत्रकार प्रीतिश नंदी भी थे, जिनकी गहरी राजनीतिक पैठ है। वहीं ‘एक विवाह...’ में म्यूजिक रविंद्र जैन ने दिया है। श्री जैन प्रदेश सरकार में खासा दखल रखते हैं। उन्होंने यहां ‘संगीत अकादमी’ की स्थापना की है।
‘कुशर प्रसाद...’ में अभिनय कर रहे पंकज त्रिपाठी कहते हैं-‘फिल्म निर्माण एक ऐसा बिजनेस है, जिसमें अब नुकसान की आशंका न के बराबर रह गई है।’
‘प्रॉवोक्ड’ फेम जग मूंदड़ा, ‘फैशन’ फेम मधुर भंडारकर की भोपाल से निकटता का एक कारण ‘पैसा’ है। ‘छोटी-सी बात’,‘खट्टा मीठा’ जैसी दर्जनों विशुद्ध पारिवारिक हास्य फिल्में बनाने वाले ख्यात निर्देशक वासु चटर्जी को सीहोर के एक फाइनेंसर ने ऑफ़र किया है। श्री चटर्जी के संग ‘बांछा का बगीचा’ नामक फिल्म का निर्माण करने जा रहे वीरेंद्र राठौर कहते हैं-‘फिल्मों में पैसा लगाना अच्छा सौदा है, लेकिन भोपाल के फाइनेंसर्स को कुछ साल पहले तक कड़वे अनुभव ही रहे हैं। दरअसल, वे ऐसे प्रोडक्शन हाउसेस या निर्देशकों पर दांव खेल जाते हैं; जो सिर्फ अपना हित देखते हैं। हालांकि पिछले कुछ सालों के दौरान भोपाल के फाइनेंसर मुनाफा ही कमा रहे हैं।’ इन दिनों सब टेलीविजन पर प्रसारित हो रहे कॉमेडी सीरियल ‘ये चंदा कानून है’ के प्रोड्यूसर तुषीर और राजाराम पाटीदार भी भोपाल के हैं।
लीडर सबसे आगे
मुंबई को सालाना करीब 50 करोड़ रुपए पहुंच रहा है। इसमें 50 प्रतिशत नेताओं का पैसा है। दूसरे नंबर पर बिल्डर्स आते हैं। विश्वस्त सूत्र बताते हैं कि प्रदेश के एक मंत्री ने मुंबई के अंधेरी स्थित एक ‘प्रोडक्शन हाउस’ में पैसा लगाया है। वहीं कांग्रेस सरकार के मंत्रीमंडल में शामिल रहे एक नेता का बेटा बतौर हीरो एक फिल्म में आने वाला है। यह ठीक रामविलास पासवान जैसी स्थिति है। श्री पासवान के बेटे की भी बतौर हीरो एक फिल्म आ
रही है।
अफसर भी हैं मीडिएटर
निर्देशकों और नेताओं/बिल्डर्स के बीच मध्यस्थता निभाने में भोपाल के कुछ सिनेमा मालिकों के अलावा सरकारी अफसर भी मीडियेटर की भूमिका निभा रहे हैं। गौरतलब है फिल्म के कई महत्वपूर्ण संस्थानों जैसे-पूना फिल्म इंस्टीट्यूट, चिल्ड्रन फिल्म सोसायटी और सेंसर बोर्ड में भोपाल से जुड़े ‘शख्स/आईएएस/आईपीएस’ महत्वपूर्ण पदों पर बैठे हुए हैं। कुछ महीने पहले यहां के एक बिल्डर्स ने भोपाल में ‘फिल्म स्टूडियो’ के निर्माण में रुचि दिखाते हुए फिल्म विधा से जुड़े कुछ लोगों से मीटिंग भी की थी।
यहां डूब गया पैसा
करीब 6 साल पहले भोपाल में सीरियल निर्माण करने आए फिल्म निर्माता आनंद महेंद्रू ने अपने तीन प्रोजेक्ट के लिए भोपाल से पैसा उठाया था। हालांकि बाद में यह पैसा फंस गया। ऐसी ही स्थिति मोहन चोटी की एक फिल्म को लेकर हुई थी। इसके लिए कांग्रेस के एक पूर्व मंत्री ने मोहन चोटी को 5 लाख रुपए दिलाए थे, जिनमें से बमुश्किल 3 लाख ही वसूल हो पाए। करिश्मा कपूर की एक फिल्म भी इसका एक उदाहरण है। यह फिल्म बन ही नहीं पाई। इन खट्टे-कड़वे अनुभवों से सबक सीखते हुए भोपाल के फानेंसर अब मीडियेटर की हेल्प लेने लगे हैं।

भोपाल से किसका कितना पैसा


नेता 50% बिल्डर्स 30% उद्योगपति 20%
(फिल्म प्रोडक्शन में उच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों से चर्चा के आधार पर। कई लोग फिल्म निर्देशकों/निर्माताओं को ब्याज पर पैसा देते हैं।)

Friday 25 September 2009

ब्लैक; कान्फिडेंस भी लाता है

अमिताभ फ़रोग
ब्लैकअंधेरे और शक्ति दोनों का प्रतीक है। यह व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वो उसे किस ऊर्जा के साथ आत्मसात करता है।स्टार प्लसके लोकप्रिय सीरियलविदाईमें सांवली-सलोनी रागिनी का किरदारजीरहीं पारुल इसका सशक्त उदाहरण हैं। टेलीविजन की चुनिंदा एक्ट्रेस में शुमार पारुल सोमवार को अपने सांवले-सलोने अंदाज में मुखातिब हुईं

ब्लैक कुर्ती; ब्लैक जींस और इसी रंग के लांग बूट यानी टोटल वेस्टर्न आउटफिट में रंगीं पारुलब्लैकको कुछ यूं परिभाषित करती हैं-‘यह व्यक्ति के नजरिये पर निर्भर करता है कि वो; इसे कैसे अपनाता है? किसी को गोरापन पसंद है, तो कोई डस्की लड़कियों को अधिक तवज्जो देता है। बिपाशा बसु डस्की हैं, लेकिन उन्होंने अपने टैलेंट और कान्फिडेंस के बूते फिल्म इंडस्ट्री में एक विशिष्ट मुकाम हासिल किया। मैं डस्की हूं, इस पर मुझे गर्व है; क्योंकि इसी रंग की बदौलत लोग मुझे पहचान रहे हैं-सम्मान दे रहे हैं। कभी किसी ने यह नहीं बोला कि; छि: यह लड़की काली है!’
विदाईकी रागिनी और पारुल के अंतर पर वे खूब बतियाती हैं-‘रागिनी का किरदार हिंदुस्तानी नारी का है, जो साड़ी में जंचती है। पारुल यानी मुझे इंडियन और वेस्टर्न दोनों आउटफिट पसंद हैं।अचानक सेलेब्रिटी बन जाना; जीवन में क्या बदलाव लाता है? इस सवाल पर पारुल मुस्कराती हैं-‘मैं उत्तरप्रदेश की रहने वाली हूं। वहां और मुंबई की लाइफस्टाइल में बहुत फर्क है, इसलिए जिंदगी में बदलाव तो आता है; लेकिन मैं जैसी पहली थी, वैसी ही आज हूं। जहां तक आउटफिट की बात है, तो मैं इस बात का विशेष ध्यान रखती हूं कि जिस शहर में जाऊं; मेरा पहनावा वहां के अनुरूप/अनुकूल हो।
जब विषयविदाईपर आकर ठहरता है, तो पारुल चहक-सी पड़ती हैं-‘दर्शकों के बीच यह सीरियल बहुत लोकप्रिय है। इसे दो साल हो गए हैं। हम पिछले दिनों यूके होकर आए हैं। वहां की भारतीय कम्यूनिटी में विदाई खूब पसंद किया जा रहा है। लोग टिकट लेकर हमसे मिलने आए।
वर्किंग टाइम को लेकर पारुल मुस्कराती हैं-‘मैंने लगातार 16 घंटे भी शूटिंग की है। जब मैं झलक दिखला जा...रियलिटी शो कर रही थी तब; मीरा रोड से अंधेरी तक 50 किलोमीटर तक गाड़ी खुद ड्राइव करके जाती थी। स्टूडियो में ही मेरे लिए अलग से बाथरूम का इंतजाम किया गया था, ताकि मैं वहीं से तैयार होकर सेट पर पहुंच जाऊं।क्या पारुल डांस करना सीख चुकी हैं? इस प्रश्न पर वे खिलखिलाती हैं-‘पहले अवश्य मुझे कई डांसिंग स्टेप करने में परेशानी होती थी, लेकिन जब झलक दिखला जा... रियलिटी शो किया; तब कोरियोग्राफर ने मेरे लिए बहुत परिश्रम किया। अब तो इंडियन-वेस्टर्न हर डांस स्टेप देखते ही उसे कॉपी कर लेती हूं।
गरबा स्टेपपर पारुल कान्फिडेंटली बोलती हैं-‘सच कहूं, तो मैंने कभी गरबा नहीं खेला। जिस सोसायटी में मेरा घर है, वहां नवरात्रि के दौरान थोड़ा-बहुत डांडिया कर लेती हूं।

Tuesday 22 September 2009


भोपाल के ‘गुड्डू-चार्ली’ से हुआ ‘कमीने’ का जन्म
बच्चों के लोकप्रिय कार्टून सीरियलमोगलीके गीत-‘चड्ढी पहनके फूल खिला है...’ को संगीत से संवारने वाले म्यूजिक कम्पोजर विशाल भारद्वाज यह बताते हुए खुशी महसूस करते हैं कि उनकी सुपरहिट फिल्मकमीनेका कैरेक्टर भोपाल के जूनियर आर्टिस्ट सप्लायर शरीफ-उर-रहमान उर्फ गुड्डू चार्ली से प्रेरित है। फिल्म पंडितों द्वारा सराही गर्इंमकबूलऔरओमकाराजैसीनाटकप्रधान फिल्मबनाने वाले विशाल मीडिया से फ्रैंडली बतियाए...

हां, यह सच है कि ‘कमीने’ में शाहिद कपूर ने जिन दो किरदारों को अभिनीत किया है, वे भोपाल के गुड्डू चार्ली से प्रेरित हैं। भोपाल को अपना दूसरा घर मानने वाले प्रयोगवादी निर्देशकों में शुमार विशाल यह बताते हुए अत्यंत उत्साहित नजर आए-‘मैं जब यहां मकबूल की शूटिंग करने आया था, तब किसी ने जूनियर आर्टिस्ट सप्लायर्स के लिए मुझे गुड्डू चार्ली का नाम सुझाया था। तब मुझे लगा था कि यह किन्हीं दो व्यक्तियों के नाम होंगे। बाद में जब मैं उनसे मिला, तब मालूम चला कि यह तो एक ही व्यक्ति का नाम है। शरीफ बेहद इंस्ट्रेस्टिंग पर्सन हैं। मुझे लगा कि यह नाम किसी फिल्म में अवश्य इस्तेमाल करूंगा। पहले मैं कमीने का नाम गुड्डू-चार्ली ही रखने वाला था।’
कमीने के प्रिंट में डार्कनेस के प्रश्न पर विशाल खुलासा करते हैं-‘मैं अपने प्रोडक्शन से शतप्रतिशत संतुष्ट हूं। डार्कनेस फिल्म की थीम थी। इस फिल्म में हमने हैंड हैल्ड फार्म अपनाई है, जिसमें कैमरा स्टिक पर नहीं, हाथों पर ही रहता है। इस वजह से क्लोजअप शॉट लेते वक्त भी कैमरा हिलता है।’ हालांकि वे यह भी मानते हैं कि डिजिटल और फिजिकल प्रिंट में थोड़ा फर्क आ जाता है। इसलिए आगे इस बात का मुझे ध्यान रखना होगा कि दोनों के प्रिंट ठीक रहें, उनमें बेवजह डार्कनेस न आ पाए।
शेक्सपियर से बेहद प्रभावित विशाल स्वीकारते हैं कि; वे हर फ्लेवर की फिल्म बनाने की ख्वाहिश रखते हैं-ओमकारा और मकबूल जैसी क्लासिक और सोशल, हास्यप्रधान मसाला फिल्में भी। उन्होंने माना कि; अब तक उन्होंने जितनी फिल्में बनार्इं, कमीने ने उनसबको मिलाकर अकेले बिजनेस दिया।
वीडियो पायरेसी रोक पाने में सरकार की अक्षमता पर विशाल नाराजगी जताते हैं-‘अगर मैं फिल्म इंडस्ट्री की ओर से बात करूं, तो हम अधिक प्रिंट्स के साथ इसलिए फिल्में रिलीज करते हैं ताकि पहले ही हफ्ते बिजनेस कवर हो जाए। यह पायरेसी से लड़ने का एक तरीका है।’ वे शब्दों पर जोर देते हैं-‘पायरेसी बिग...बिग...बिग क्राइम है।’
अपनी हर फिल्म में क्राइम को फोकस करने वाले विशाल दो टूक कहते हैं-‘क्राइम के बगैर मैं फिल्में बना ही नहीं सकता। अगर आध्यात्मिक कहानी पर भी फिल्म बनाऊंगा, तो उसमें भी आध्यात्मिक हिंसा का भाव निहित होगा।’ हालांकि यह कहने के साथ ही वे जोर वे हंसने भी लगते हैं। विशाल बिंदास बोलते हैं-‘मैं मैसेज देने के लिए फिल्में नहीं बनाता। एक समय में मेरे पास 10-15 फिल्में होती हैं। जब पैसा लगाने वाला मिल जाए, फिल्म शुरू कर देता हूं।’ वे यह कतई नहीं मानते कि भारत में कहानियों की कमी है-‘कमी स्क्रिप्ट की नहीं, पैसा लगाने वालो की है।’
ब्लैक टी शर्ट और इसी कलर का पॉकेट जींस पहने विशाल से जब पूछा गया कि; ब्लैक वर्चस्व का प्रतीक है, आप का पहनावा क्या यही दर्शाता है? वे दार्शनिक अंदाज में बोेलते हैं-‘बशीर बद्र साहब का एक शेर है, जिसमें चुप रहने से पैदा हुई गलतफहमियों बयां की गई हैं, ठीक यही स्थिति मेरे साथ हो रही है। मैं जो नहीं कहता, मीडिया वो सुन लेती है।’
भारतीय फिल्म उद्योग में सोनी, वार्नर ब्रदर्स और फॉक्स जैसी हॉलीवुड बेस्ट प्रोडक्शन कंपनियों के आगमन पर विशाल दो टूक कहते हैं-‘उनका सिर्फ एक मकसद है-मुनाफा कमाना, बाकी कोई दूसरा सरोकार नहीं है।’
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रेखा भारद्वाज (पार्श्व गायिका)
पति म्यूजिक डायरेक्टर हों, तो नफा-नुकसान दोनों होता है
सूफी गायन में एक अलग मुकाम रखने वालीं पार्श्व गायिका रेखा भारद्वाज स्वीकारती हैं कि अगर पति म्यूजिक कम्पोज कर रहे हों, तो रिकार्डिंग के दौरान थोड़ा डर तो बना ही रहता है। हालांकि वे आगे यह भी कहती हैं कि; विशालजी को मेरी खूबियां और कमजोरियां दोनों पता हैं, इसलिए वे मुझसे अच्छा वर्क करा लेते हैं। ‘रूह’ नाम से सूफी बैंड संचालित करने वालीं रेखा कहती हैं-‘पहले जब लोगों को मालूम चला कि ये तो विशालजी की पत्नी हैं, तो वे मुझसे गाना गंवाने में संकोच करते थे। यह देखते हुए विशालजी ने ओमकारा में नमक इश्क दा... मुझे गंवाया। यह गाना इतना लोकप्रिय हुआ कि अब दूसरे म्यूजिक डायरेक्टर भी मुझे बुलाने लगे हैं।’ चर्चा के दौरान रेखाजी ने लोगों की फरमाइश पर अपना बेहद चर्चित गीत-‘सैंया छेड़ देवे, ससुरजी गारी देवे..ससुराल गेंदा फूल...’ भी सुनाया।

(यह साक्षात्कार पीपुल्स समाचार, भोपाल में प्रकाशित हुआ है)

Wednesday 16 September 2009


‘लोकनायक’ अभिनय नहीं; तपस्या थी’
अमिताभ फरोग
प्रकाश झा कृत ‘राजनीति’ के अभिनेता चेतन पंडित कतई नहीं मानते कि; वे लगातार नेता और पुलिस का रोल करते-करते ‘टाइप्ड’ हो चुके हैं। वे दार्शनिक और आध्यात्मिक लहजे में धाराप्रवाह बोलते हैं-‘हर किरदार का अपना एक चरित्र होता है। जब आप एक पुलिसकर्मी का रोल करते हैं, तो आपका व्यक्तित्व/चरित्र अलग बोलता है...और कमिश्नर के चरित्र में उतरने वक्त आपके अभिनय का अंदाज एकदम जुदा हो जाता है। कोई पात्र; जितनी बार बदलेगा, उसके मूल चरित्र में फर्क आता जाएगा। चेतन ‘राजनीति’ करने इन दिनों भोपाल में हैं। रील और रियल लाइफ के विभिन्न शेड्स पर वे बेबाक बतियाए...
एक ‘फिल्मी पंडित(आलोचक)’ के अंदाज में चेतन कहते हैं-‘अभिनेता कोई भी हो; उस पर ‘टाइप्ड’ होने का तमगा चस्पा नहीं किया जा सकता, क्योंकि हर चरित्र का अपना एक वजूद होता है। अगर आप गंगाजल देखेंगे, अपहरण देखेंगे या लोकनायक; मेरा कोई भी किरदार एक-दूसरे के चरित्र से मेल नहीं खाता। सच तो यही है कि रील और रियल दोनों लाइफ में कोई एक चरित्र; दूसरे चरित्र-सा हो ही नहीं सकता।
अपने कहे हर शब्द को एक ‘नई वैचारिक परिभाषा’ में रूपांतरित करते हुए चेतन ‘लोकनायक’ फिल्म को कसौटी पर रखते हैं-‘मेरे लिए हर चरित्र महत्वपूर्ण रहा, लेकिन जहां अति शब्द जुड़ेगा; वहां मैं लोकनायक का जिक्र करूंगा। वो किरदार मेरे लिए काम नहीं; तपस्या था। उसमें अटल बिहारी वाजपेयीजी, भैरो सिंह शेखावत जैसे पारखियों के कमेंट भी हैं। प्रकाश झा ने मुझे 10-15 मिनट की एक डाक्यूमेंट्री दिखाई दी, उसे देखकर मैंने लोकनायक को जीया। रियल लाइफ के किरदारों में खुद को उतारना अत्यंत कठिन कार्य है। फिक्शन में आपको निर्देशक के नरेशन पर निर्भर रहना पड़ता है। ज्यादातर इनपुट उसी का होता है। इसमें अभिनेता सिर्फ थोड़ा-बहुत इनपुट डाल सकता है। रियल लाइफ पोट्रेट में आप और निर्देशक अपनी ओर से बहुत-कुछ नहीं कर सकते। बेन किंग्सले इंडियन नहीं थे, फिर भी उन्होंने गांधी को संतुलित धड़कनों के साथ जिया; अभिनय किया। इसके पीछे केवल अभिनय की अच्छी समझ-परख ही काम आई।’
चेतन के लिए ‘रंगमंच’ एक जीवन है; एक ऐसी जिंदगी, जिसको वे भरपूर जीते हैं। वे अपनी ‘रंगमंचीय शैली’ पर फोकस करते हैं-‘इन दिनों मैं एक प्ले की तैयारी कर रहा हूं, जो हरमेन हेस रचित पुस्तक सिद्धार्थ पर केंद्रित है। इसे भोपाल, इंदौर, देवास और उज्जैन में मंचित करने का प्लान है। यह एक जर्मन प्ले है, जिसमें मैं एकल अभिनय कर रहा हूं। हालांकि इसी प्ले को मैं 29 दिसंबर, 1999 में देवास में मंचित कर चुका हूं, लेकिन हर बार यह मेरे लिए एक नई चुनौती होता है। पहली बार इसे मैंने 140 फीट लंबे मंच पर पेश किया था। दर्शकों को संवाद ठीक से समझ आएं, इसलिए मल्टी ट्रेक रिकार्डिंग की थी। इस बार इसमें मंच कुछ यूं डिजाइन होगा, जिसमें संवाद रिकार्ड नहीं करने पड़ेंगे। इस प्ले में मैं आर्ट डायरेक्टर, डायरेक्टर, लाइट डिजायनर, म्यूजिक कम्पोजर के अलावा अभिनेता; सबकी भूमिका में दिखूंगा। मेरा मानना है कि अगर आपके हाथ में ये सभी चीजें आ जाएं, तो मीडियम ऑफ़ एक्सप्रेशन का पावर बढ़ जाता है। इस प्ले की एक लाइन मेरी चेतना-शक्ति का आधार है, जिसमें उल्लेख किया गया है कि उपदेशों से कभी मोझ नहीं मिलता। यही कारण है कि मेरा हर दिन; हर कार्य और हर रास्ता हर बार अलग/सकारात्मक ऊर्जा से भरा/संरचनात्मक होता है।’
प्रकृति के विविध रंगों/रचनाओं से ‘सबक’ सीखने को सदैव आतुर रहने वाले चेतन कहते हैं-‘मुझे ट्रैवलिंग में बहुत आनंद की प्राप्ति होती है। दरअसल, हम उसे ही अपनी दुनिया मानकर चलते हैं, जिसे हमने देखा-सुना-पाया, लेकिन संसार इससे कहीं बड़ा है। मैं जहां भी जाता हूं, यूं महसूस होता है कि मेरा संसार थोड़ा और बढ़ा हो गया। कला का संसार जितना व्यापक रहे, अभिनय के रंग उतने अधिक चटख होते हैं। मैं जहां भी जाता हूं, वहां की स्मृतियां मेरे जेहन में सदा के लिए शैलचित्रों-सरीखी अंकित हो जाती हैं। स्वाभाविक है, जब संसार बढ़ेगा, तो आपके सोचने/समझने का नजरिया भी विकसित होगा, आपकी परफार्मेंस में निखार आएगा।’
लोकतंत्र के बदलते ‘राजनीतिज्ञ चरित्र’ पर चेतन कड़वा सच बोलते हैं-‘लोकतंत्र पारिभाषिक रूप में अच्छा है, लेकिन सही मायने में लोक का तंत्र अब देखने को कहीं नहीं मिलता। हर भारतीय अधिकांशतौर पर करप्ट है, इससे दु:ख होता है। हमें पता है कि सिस्टम में लूप होल है, फिर भी चुप हैं। आखिर इस जन्मभूमि के प्रति हमारा भी कुछ दायित्व बनता है?’
चेतन: प्रोजेक्ट और प्रायोरिटी
-चेतन की पत्नी कनुप्रिया पंडित मजदूर बच्चों के हितों को लेकर थियेटर करती हैं। चेतन उसमें हेल्प करते हैं।
-चेतन निर्देशक मधुर भंडारकर की फिल्म के अलावा जूम चैनल का एक फिक्शन भी कर रहे हैं।
-चेतन बुधवार को देवास में नवरत्न सम्मान से नवाजे गए हैं। वे कहते हैं-‘देश/समाज के प्रति मेरा दायित्व थोड़ा और बढ़ गया है।’

Tuesday 15 September 2009


आत्मा से गाओ पब्लिक क्या ईश्वर भी सुनेंगे

अमिताभ फरोग
हिंदुस्तान के श्रेष्ठतम ‘म्यूजिकल-पॉप ग्रुप’ में शुमार ‘आर्यन्स’ के सदाशिव ‘सिदु’ का मानना है कि सिनेमाई संगीत ‘फास्ट फूड’ सरीखा कार्य करता है; इससे पेट भरता है, आत्मा नहीं। परफॉर्मेंस के दौरान सुरों में मन-मष्तिष्क को ‘तृप्ति’ देने वाली मिठास घोलने वाले सिदु अपनी बात रखते वक्त कड़वे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं-‘आज स्थिति यह है कि फिल्मी गाने कब-कहां गुम हो जाते हैं, पता ही नहीं चलता? दरअसल, फिल्मी गाने फैक्ट्री प्रोडक्ट-सरीखी उपज होते हैं। इनमें कलाकार का आत्मिक-समर्पण न के बराबर होता है।’
दुनियाभर में लाइव प्रोग्राम कर चुके सिदु ‘मैलोडी’ की नई परिभाषा गढ़ते हैं-‘नुसरत फतेह अली खान हों या रहमान; इनके शब्दों में स्मूथनेस नहीं है, बावजूद वे शिद्दत से सुने जाते हैं-सुकून देते हैं। कारण सिर्फ इतना है कि वे गाते नहीं; साधना करते हैं, शब्दों में आत्मा उड़ेल देते हैं।’ सिदु ‘फिल्म स्टार्स के लाइव शो’ को कतई ‘लाइव’ नहीं मानते। वे विवेचना करते हैं-‘आप मैडोना का शो देखिए, ब्रिटनी को सुनिए; उसके बाद विश्लेषण करना कि शाहरुख आदि कहां टिकते हैं? महज बॉडी एक्सप्रेशन किसी शो को लाइव नहीं बनाता। मेरे लिए लाइव शो वो है, जो श्रोताओं/दर्शकों को ऊर्जित कर दे, उसकी धड़कनों की रफ्तार बढ़ा दे/घटा दे।’
दुनियाभर में शो कर चुका ‘आर्यन्स’ 14 दिन के यूके टूर पर जाने वाला है। सिदु दुनिया में ‘बैंड्स’की लोकप्रियता पर कुछ यूं बोलते हैं-‘आर्यन्स हो या कोई दूसरा बैंड; उनके क्रेज के पीछे मौलिकता का भाव निहित है। वे गाने रचते हैं, उन्हें कम्पोज करते हैं और फिर खुद परफर्म भी करते हैं। फिल्मों में ऐसा नहीं होता। वहां गाने प्रोडक्ट बेस्ड होते हैं। एक लिखता है, दूसरा कम्पोज करता है और कोई तीसरा व्यक्ति गाता है। ऐसे में नेचुरल फीलिंग कहां से आएगी? आर्यन्स के अलावा आप किसी भी बैंड को सुनिए, चाहे वो सिल्वर रूट हो या यूफोरिया; उनके लाइव शो हर बार नई ताजगी, मधुरता लिए होते हैं।’
सिदु एक एक्सपीरियंस शेयर करते हैं-‘लास्ट ईयर कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में मेरा शो था। उसी प्रोग्राम में जोशीले बैंड की परफॉर्मेंस भी होनी थी। अचानक इस बैंड के एक मैंबर मेरे पास आए और मुस्कराते हुए बोले; आपके अलबम-देखा है, तेरी आंखों को...के दूसरे सांग-तेरी यादों में...कुछ रशियंस को बहुत पसंद आया है। मैंने उन्हें वह सीडी खरीद कर दी है, उसके कीमत (500 रुपए ) लौटा दीजिए। वो मेरे लिए कॉम्पलीमेंट था।’
‘आर्यन्स’ किस शैली/विधा को फॉलो करता है? इस सवाल पर सिदु दो टूक कहते हैं-‘मैं आर्यन्स को क्लासीफाइड नहीं कर सकता। हम फ्यूजन भी रचते हैं, सूफी भी गाते हैं, क्लासिकल/सेमी क्लासिकल की फीलिंग भी होती है। हमारा ध्येय गीत-संगीत में आत्मिकभाव उतारना होता है। कोई अपने म्यूजिक की लाख प्रशंसा करे; लेकिन कर्णप्रिय वो गीत-संगीत है, जिसे पारखी भी सुनें; अज्ञानी भी गुनगुनाएं।’
सिनेमा में बैंड...
सिदु कहते हैं-‘हम बैंड वाले फिल्मों की ओर नहीं भागते। चूंकि फिल्मी गाने सिचुएशन पर रचे जाते हैं, इसलिए इस क्रियेटिविटी में नेचुरल-टच/फीलिंग मिस हो जाती है। आर्यन्स गाने रचता है और उन्हें कम्पोज भी करता है। जिस निर्माता/निर्देशक को वो जंच जाते हैं, वे उनके मुताबिक फिल्मों में सिचुएशन पैदा कर देते हैं। जैसा आपने वुड स्टॉक विला फिल्म में देखा होगा। इसमें हमने एक रॉक सांग-क्यूं...परफर्म किया था। बहरहाल, विक्रम भट्ट और स्मिता ठाकरे के साथ कुछ प्रोजेक्ट पर कार्य चल रहा है। बहुत जल्द मार्केट में एक नया अलबम आ रहा है, जिसमें 9 गाने हैं। उनमें आपको इमोशन, क्रियेशन, फ्यूजन, सूफी सभी फीलिंग मिलेंगी।’
इंडिया में म्यूजिक के स्तर पर सिदु साफ-साफ शब्दों का इस्तेमाल करते हैं-‘इंडिया में टैलेंट बहुत है, लेकिन उन्हें सही रास्ता नहीं मिलता। कुछ फिल्मों की ओर भागते हैं, तो कुछ अपने हुनर को प्रोडक्ट-सा बना देते हैं। उसमें मौलिकता, कर्णप्रियता सबकुछ होच-पौंच हो जाती है। मैं उस टैलेंट की कद्र करता हूं, हेल्प करने का भरोसा दिलाता हूं, जिसकी क्रियेटिविटी में नेचुरल फीलिंग हो।’

आर्यन्स के बारे में
-यह ग्रुप दो लोगों के क्रियेशन पर चलता है-सिदु और धर्मेंद जय नारायण।
-यह पॉप ग्रुप अब तक कई हिट अलबम-आंखों में तेरा ही चेहरा, ये हवा कहती है क्या, देखा है तेरी आंखों को, विक्टरी, बेस्ट आॅफ आर्यन्स, हाय दिल, कहता है दिल यही बार-बार...म्यूजिक इंडस्ट्री में उतार चुका है।
-भारतभर में 700 से अधिक शो करने के अलावा यह ग्रुप दुनियाभर में अपनी परफार्मेंस दे चुका है। जैसे; यूके, यूएसए, साउथ अफ्रीका, दुबई, मलेशिया, थाइलैंड, मॉरीशस, शारजहां, सिंगापुर, आस्ट्रेलिया आदि।

Friday 11 September 2009



‘चाय के बहाने’ से हिट हुए अभिषेक-इश्तयाक
अमिताभ फरोग
हालिया रिलीज फिल्म ‘चिंटूजी’ के लोकप्रिय गीत-‘चाय के बहाने...’ से प्रदेश की दो और प्रतिभाएं बॉलीवुड में अपनी पैठ बनाने में कामयाब रही हैं। संगीत और रंगकर्म में पिछले 20 वर्षों से सक्रिय रीवा के अभिषेक त्रिपाठी और पन्ना के इश्तयाक का यह कम्पोज किया गीत प्रियांशु चटर्जी और कुलराज रंधावा पर फिल्माया गया है। संभवत: मध्यप्रदेश की यह पहली संगीतकार जोड़ी है, जो बॉलीवुड में अपने मुकाम पर निकल पड़ी है। इस जोड़ी ने की अपनी बातें...

इश्तयाक-अभिषेक त्रिपाठी की जोड़ी वर्ष, 2006 में अपने उड़िया एलबम ‘ओढ़नी रोंगेयिली तोनारे’ से चर्चा में आई थी। इसका एक गीत-‘ओ पिया पिया...’ उस साल सुपर-डुपर हिट रहा था। अभिषेक बताते हैं-‘बचपन में एक रोज सर्कस देखने गया। वहां बैंड की धुनों ने मुझे बहुत आनंदित किया। बस, तभी से मैं धीरे-धीरे संगीत ओर कदम बढ़ाता गया। वर्ष,1993 से 2000 तक कई नाटकों का संगीत निर्देशन किया।’
और मिला दोस्त...
इश्तयाक ने ‘चिंटूजी’ में अभिनय भी किया है। अभिषेक यादें ताजा करते हैं-‘मैं दिल्ली में प्लेबैक और लाइट म्यूजिक के गुर सीखने सुप्रसिद्ध संगीतकार पं. ज्वालाप्रसादजी के पास गया था। वहीं इश्तयाक से मुलाकात हुई। इश्तयाक उन दिनों नेशनल स्कूल आॅफ ड्रामा में अभिनय-कला सीख रहा था। यहां हम दोनों ने मिलकर संगीत सीखा और वर्ष, 2004 में मुंबई आ गए।’ इस जोड़ी ने कई विज्ञापन फिल्मों और सीरियल्स में संगीत दिया है। बतौर म्यूजिक डायरेक्टर ‘चिंटूजी’ उनकी पहली फिल्म है। अभिषेक ने मुम्बई में प्रतिष्ठित संगीतकार प्रीतम और अमर हल्दीपुर आदि के साथ रहकर अपने काम की शुरुआत की थी।
इश्तयाक कहते हैं-‘जैसा मुझे रिस्पांस मिला है, लोगों को चाय के बहाने...काफी पसंद आया है। चूंकि इसमें यादों के झरोखे, रोमांस और मेलोडी; सबरंग निहित हैं, इसलिए इसका फिल्मांकन भी दर्शकों को भा रहा है।’ अभिषेक बताते हैं-‘हमारी जोड़ी का एक सूफियाना म्यूजिक एलबम-मीरा बहुत जल्द मार्केट में आ रहा है। इसमें आपको प्योर डिवोशनल टच नहीं; बल्कि ग्लोबल म्यूजिक-फ्यूजन की सुमधुरता भी सुनने को मिलेगी।’
रीवा के टीआरएस कॉलेज में प्रोफेसर डॉ. सेवाराम त्रिपाठी के सुपुत्र अभिषेक आरडी बर्मन को अपना गुरु मानते हैं। वे कहते हैं-‘एकलव्य की तरह मैंने उनके संगीत और वैचारिक विधि का शोध-अनुसंधान किया और उसे आत्मसात किया। सुरों को नए आयाम देना और उसे कम्पोजिशन में एक्सप्रेशन की अधिकतम ऊंचाई तक ले जाना तथा प्रयोगधर्मिता की नवीनता मैंने बर्मन साहब से ही सीखी है। मैं मानता हूं कि मेरे भीतर बर्मन-इफेक्ट काम करता है।’

Wednesday 2 September 2009


लोग ‘जड़’ और ‘चेतना’ में अंतर भूल गए हैं
अमिताभ बुधौलिया 'फरोग'
जाने-माने फिल्म अभिनेता सुरेश ओबेराय प्राकृतिक आपदाओं और जलवायु में बुरे परिवर्तन के लिए लोगों को ही दोषी मानते हैं। एक निजी कार्यक्रम के सिलसिले में भोपाल आए श्री ओबेराय ने तल्ख लहजे में कहा कि; ‘बात प्रकृति की हो या किसी अन्य विषय की, लोग तहजीब भूल चुके हैं।’ ‘सिनेमाई चर्चा’ से इतर श्री ओबेराय प्रकृति और लोगों की सोच में आए दूषित बदलावों पर खुलकर बोले...

करीब 150 फिल्मों में अभिनय कर चुके सुरेश ओबेराय कड़े लहजे में कहते हैं-‘सूखा क्यों पड़ रहा? मानसून में गड़बड़ी की क्या वजह है? यह कोई समझना नहीं चाहता। दरअसल, यह प्रकृति का संकेत है-कि इंसानों सुधर जाओ! संकट ग्लोबल वार्किंग का हो या पर्यावरण असुंतलन का; आवश्यकता लोगों को अपना दिमाग ठिकाने लाने की है। जब तक हमारी सोच नहीं बदलेगी, तब तक प्रकृति अपने गुस्से का इजहार करती रहेगी। लोग ‘प्यार’ शब्द का आशय भूल चुके हैं। प्यार धरती भी मांगती है और जंगल-जानवर भी।’ वे खुलकर बोलते हैं-‘यह हमें ही समझना होगा कि ईको-फ्रैंडली कैसे रहना है? चिंताजनक बात यह है कि लोग अनुशासन में रहना ही नहीं चाहते। जो लकड़ी पलंग बनाने से लेकर अंतिम क्रिया तक में काम आती है, आज हम उसका महत्व नहीं समझते। हम जड़ और चेतना में अंतर बिसरा चुके हैं। पेड़ काटे तो खूब जा रहे, लेकिन लगाने के नाम पर लोग पल्ला झाड़ लेते हैं।’
80 के दशक में अपना फिल्मी सफर शुरू करने वाले श्री ओबेराय ‘वास्तुशास्त्र’ को ठीक से परिभाषित करते हैं-‘वास्तु का मतलब सिर्फ मकानों का ठीक से निर्माणभर नहीं होता। इसका आशय हमारी विनम्रता से भी जुड़ा होता है। हमने प्रकृति/धरती से क्या लिया और उसे क्या दिया? यह भी वास्तु का एक हिस्सा है। पहले के लोग अगर फूल भी तोड़ते थे, तो प्रकृति से क्षमा मांगते थे या उस पेड़ की रक्षा/पालने-पोसने का संकल्प लेते थे। आज स्थिति यह है कि हम प्रकृति से चाहते तो बहुत हैं, लेकिन जब बात कर्ज उतारने की आती है; तो मुंह फेर लेते हैं।’
वर्ष, 1981 में आई फिल्म ‘लावारिस’ में अपने सशक्त अभिनय के बूते अमिताभ बच्चन को भी पीछे छोड़ देने वाले सुरेश ओबेराय समझाइश देते हैं-‘अगर हम न चेते, तो ग्लोबल वार्किंग बढ़ती जाएगी, गंगा जैसी नदियां सूख जाएंगी; फिर बैठे रहना हाथ पे हाथ धरे!’ देश में सूखे के संकट पर उन्होंने स्पष्ट कहा-‘सूखे का सीधा मतलब है, प्रकृति आपसे नाराज है। धरती आपको पुकार रही है, आपको आपकी गलतियों के लिए चेता रही है। अगर हम फिर भी न चेते; तो भविष्य में स्थिति और बिगड़ेगी।’
पर्यावरण असंतुलन से चिंतित श्री ओबेराय बताते हैं-‘मैंने अपने फार्महाउस में करीब 400 पौधे रोपे थे, जो अब काफी बड़े हो गए हैं।’ भोपाल के प्राकृतिक सौंदर्य से अभिभूत दिखे श्री ओबेराय खुशी जताते हैं-‘मैं देशभर में घूमता रहता हूं, भोपाल प्राकृतिक रूप से समृद्ध है। यहां चारों ओर हरियाली देखने को मिलती है। यहां साफ-सफाई भी बहुत है।’ राजधानी में पर्यावरण संरक्षण के मुद्दे पर श्री ओबेराय कहते हैं-‘मैं इस शहर को हरा-भरा बनाने में अपना योगदान देने को तैयार हूं। कोई मुझे बुलाएगा; तो मैं अवश्य आऊंगा, लेकिन यह कार्यक्रम राजनीति से प्रेरित नहीं होना चाहिए। मुझे एनजीओ या राजनीतिक आयोजनों में कोई दिलचस्पी नहीं है।’