शुक्रवार, 10 फरवरी 2012

दिस वेलेंटाइन-डे


किताबों के बीच रखे गुलाबों की तरह।

तकिये के नीचे छिपे प्रेम-पत्रों की तरह।

मेरे अल्फाज़ भी जुबां में छटपटाते हैं।

आंखों कुछ कहती हैं, भाव कुछ बताते हैं।

तुम समझ लेना; मेरी अनकही बातें।

मैंने काटी हैं, जागते-जागते कई रातें।

इस वेलेंटाइन भी शायद कुछ न कह सकूंगा।

लेकिन यह तय है तुम्हारी जुदाई न सह सकूंगा।

तुम पढ़ लेना मेरी आंखें और चेहरे की भाषा।

तुम ही हो मेरी आस और जीने की आशा।

बुधवार, 8 फरवरी 2012

दिल का सवाल




कोई तो मेरे दिल से पूछे बता तेरा हाल क्या है?

क्यों धड़कता रात-दिन आखिर तेरा सवाल क्या है?

क्या है तेरे भीतर; जो दर्द-सा अहसास देता है?

क्यों देता है आंखों को पानी आखिर मलाल क्या है?

कुछ तो बात है; जो जुबां तक आकर लौट जाती है?

कुछ कहता; कुछ कहना चाहे, आखिर कमाल क्या है?

शनिवार, 4 फरवरी 2012

दर्द सहना अब आदत-सी हो गई है।

दर्द सहना अब आदत-सी हो गई है।

जिंदगी गोया शहादत-सी हो गई है।।

दोस्त भी अब देने लगे हैं दगा।

मोहब्बत अदावत-सी हो गई है।।

आंखें जागी-जागी, दिन भी बेकरार।

मेरी तड़प कहावत-सी हो गई है।

सबकुछ भूला; खुद का नहीं ख्याल।

उसकी याद इबादत-सी हो गई है।